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अनंत चतुर्दशी की कहानी | अनंत चौदस की कहानी | Anant chaudas ki kahani

Published By: bhaktihome
Published on: Monday, September 16, 2024
Last Updated: Tuesday, September 17, 2024
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Anant chaudas ki kahani अनंत चौदस की कहानी
Table of contents

अनंत चतुर्दशी की कहानी, अनंत चौदस की कहानी, Anant chaudas ki kahani, anant chaturdashi ki kahani:  पंचांग के अनुसार भाद्रपद मास के शुक्ल पक्ष की चतुर्दशी तिथि को अनंत चतुर्दशी या अनंत चौदस का पर्व मनाया जाता है।  शास्त्रों में अनंत चौदस का विशेष महत्व है। इस दिन भगवान विष्णु और माता लक्ष्मी की पूजा की जाती है।  इस दिन अनंता सूत्र बांधने की परंपरा है।  

अनंत चतुर्दशी की कहानी | अनंत चौदस की कहानी  - भगवान कृष्ण ने युधिष्ठिर को सुनायी

गोस्वामी तुलसीदास की प्रसिद्ध चौपाई है। 

हरि अनंत हरि कथा अनंता। कहहिं सुनहिं बहुबिधि सब संता॥

अर्थ - हरि अनंत हैं (उनका कोई पार नहीं पा सकता) और उनकी कथा भी अनंत है। सब संत लोग उसे बहुत प्रकार से कहते-सुनते हैं।

  • भगवान कृष्ण ने युधिष्ठिर को अपने दुखों को दूर करने के लिए अनंत चौदस का व्रत करने की सलाह दी थी। 
  • कृष्ण ने व्रत के महत्व पर प्रकाश डालते हुए अनंत चौदस की कहानी (Anant chaudas ki kahani / anant chaturdashi ki kahani) सुनाई थी।

आइए जानते हैं अनंत चौदस की कहानी (Anant chaudas ki kahani)  जिसे युधिष्ठिर का खोया हुआ राज्य मिल गया।

 

क्या है अनंत चौदस की कहानी (Anant chaudas ki kahani) | अनंत चतुर्दशी की कहानी (Anant chaturdashi ki kahani)

  • प्राचीन काल में सुमंत नामक एक महान तपस्वी ब्राह्मण थे। उनकी पत्नी का नाम दीक्षा था। 
  • उनकी एक बहुत ही सुंदर, धार्मिक और तेजस्वी पुत्री थी। उसका नाम सुशीला था। जब सुशीला बड़ी हुई तो उसकी माता दीक्षा का देहांत हो गया।
  • पत्नी की मृत्यु के बाद सुमंत ने कर्कशा नामक स्त्री से विवाह किया। 
  • ब्राह्मण सुमंत ने सुशीला का विवाह कौंडिनय ऋषि से किया। विदा के समय कुछ देने के लिए कहने पर कर्कशा ने कुछ ईंटें और पत्थर के टुकड़े बांधकर अपने दामाद को दे दिए।
  • कौंडिनय ऋषि दुखी होकर अपनी पत्नी के साथ अपने आश्रम के लिए चल दिए। 
  • लेकिन रास्ते में रात हो गई। वे नदी तट पर संध्यावंदन करने लगे।
  • सुशीला ने देखा कि वहां बहुत सी स्त्रियां सुंदर वस्त्र धारण करके किसी देवता की पूजा कर रही थीं। 
  • सुशीला के पूछने पर उन्होंने अनंत व्रत का महत्व विधिपूर्वक समझाया। 
  • सुशीला ने वहीं वह व्रत किया और हाथ में चौदह गांठों वाला धागा बांधकर कौंडिनय ऋषि के पास पहुंची।
  • ऋषि कौण्डिन्य ने जब सुशीला से धागे के बारे में पूछा तो उसने सारी बात बता दी। 
  • उसने धागे को तोड़कर अग्नि में फेंक दिया, जिससे भगवान अनंत का अपमान हुआ। 
  • परिणामस्वरूप ऋषि कौण्डिन्य दुःखी रहने लगे। उनकी सारी संपत्ति नष्ट हो गई। 
  • जब उन्होंने अपनी पत्नी से इस दरिद्रता का कारण पूछा तो सुशीला ने भगवान अनंत के धागे को जलाने की बात बताई। 
  • पश्चाताप करते हुए ऋषि कौण्डिन्य अनंत धागा लेने के लिए वन में चले गए। 
  • कई दिनों तक वन में भटकने के बाद एक दिन वे हताश होकर भूमि पर गिर पड़े। 
  • तब भगवान अनंत प्रकट हुए और बोले- 'हे कौण्डिन्य! तुमने मेरा अपमान किया था, जिसके कारण तुम्हें इतने कष्ट भोगने पड़े। तुम दुःखी थे। अब तुम्हें पश्चाताप हो गया है। मैं तुम पर प्रसन्न हूं। अब तुम घर जाओ और नियमानुसार अनंत व्रत करो। चौदह वर्ष तक व्रत करने से तुम्हारा दुःख दूर हो जाएगा। तुम्हें धन-धान्य की प्राप्ति होगी। 
  • कौण्डिन्य ने ऐसा ही किया और उन्हें सभी कष्टों से मुक्ति मिल गई।
  • भगवान कृष्ण की आज्ञा से युधिष्ठिर ने भी भगवान अनंत का व्रत किया जिसके फलस्वरूप पांडव महाभारत के युद्ध में विजयी हुए और लम्बे समय तक राज्य किया।

 

अनंत चौदस का महत्व | अनंत चतुर्दशी का महत्व

  • पवित्र ग्रंथों के अनुसार, इस दिन व्रत रखने वाले और भगवान विष्णु की पूजा करने वाले लोगों को अनंत पुण्य की प्राप्ति होती है
  • कहा जाता है कि अनंत चतुर्दशी के दिन पढ़ाई शुरू करने वाले छात्र सफल होते हैं और उन्हें ज्ञान की प्राप्ति होती है।

 

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